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कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है

यह कहावत न सिर्फ एक दार्शनिक सिद्धांत है, बल्कि एक आर्थिक तथ्य भी है।

by Pranay Kotasthane (@pranaykotas)

ऊपर लिखित कहावत का प्रयोग हमने असंख्य बार सुना है । लेकिन इस संकल्पना को अर्थशास्त्र में कैसे समझा जाता है,  आइये जाने—
इस ब्लॉग श्रृंखला के पिछले प्रकरण में हमने देखा था कि तंगी से निपटने का एक तरीका है चुनाव — अर्थात अपनी-अपनी ज़रुरत और हालात के आधार पर किया गया वह फैसला जो हमारी व्यक्तिगत पसंद का परिचायक होता है । इस चुनाव को अंग्रेज़ी में ट्रेड-ऑफ कहा जाता है ।

जब भी हम अपने एक सीमित संसाधन के बदले में किसी एक चीज़ का चुनाव करते हैं तो किसी दूसरी चीज़ को जाने-अनजाने त्याग देते हैं। उदाहरणार्थ, एक ग्रेजुएट युवक/युवती के लिए एक सीमित संसाधन होता है समय। मूल्यवान संसाधन इसलिए क्यूंकि इस अवस्था में ज़िम्मेदारियाँ अक्सर काम होती हैं । सीमित इसलिए क्यूंकि  बेपरवाह जीवन बनाये रखना हमेशा संभव नहीं होता। मान लीजिये,अब इस ग्रेजुएट के सामने अपने संसाधन का उपयोग करने के केवल दो तरीके हैं — एक, ग्रेजुएशन के बाद किसी अच्छी जगह कार्यरत होना और दूसरा, पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स करना।

विकल्प आप कोई भी चुनें, उससे जुडी लागत को व्यय करना पड़ता है और यह लागत सिर्फ मौद्रिक (monetary) नहीं होती । अगर आप पोस्ट-ग्रेजुएशन का मार्ग चुनते हैं तो आप कॉलेज की फीस, ऍप्लिकेशन इत्यादि की मौद्रिक लागत उठाते हैं। लेकिन लागत सिर्फ इतनी नहीं है — इस विकल्प को चुनते ही आप कुछ सालों के लिए एक फुल-टाइम तनख़्वाह कमाने का मौक़ा भी खो देते हैं और यह भी आपकी कुल आर्थिक लागत का हिस्सा है। उसी तरह आप अगर एक फुल-टाइम जॉब का विकल्प चुनते हैं तो मौद्रिक लागत के रूप में नए शहर में सेटल होने के लिए एक मौद्रिक लागत उठाते हैं । साथ ही आप एक मास्टर्स/डॉक्टर की उपाधि हासिल करने का मौका गवाते हैं, और यह भी आपकी लागत का एक अहम हिस्सा है । इस संकल्पना को जो हमारे खोये हुए मौक़े की लागत को दर्शाती है, अवसर लागत (Opportunity Cost) कहते हैं।

अत:, किसी भी ट्रेड-ऑफ की कुल आर्थिक लागत जाननी हो तो हमें अवसर लागत को भी कुछ इस तरह सम्मिलित करना पड़ेगा —

कुल आर्थिक लागत = मौद्रिक लागत + अवसर लागत

ध्यान रहे कि कई बार अवसर लागत को एक सटीक नंबर देना मुश्किल होता है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं हैं कि हम इसको अपने विश्लेषण से हटा दे। बल्कि हमें इस पर और ज़्यादा धान देना चाहिए, क्यूंकि एक विकल्प की मौद्रिक लागत कम होते हुए भी कुल लागत कई गुना हो सकती है अगर उसकी अवसर लागत बहुत अधिक हो।

अवसर लागत की संकल्पना हमें पब्लिक पॉलिसी में किस प्रकार मददगार होती है? इस प्रकार कि सरकार के पास संसाधन हैं सीमित और ज़िम्मेदारियाँ हैं हज़ार। सरकार की हर नीति से एक अवसर लागत जुडी है । इसीलिए अगर हमें एक पॉलिसी की गुणवत्ता का विश्लेषण करना हो तो ना सिर्फ उस पर ज़ाया खर्च और मिलने वाले फायदे को जानना होगा, बल्कि यह भी देखना कि इस विकल्प को चुनकर हमने क्या मौके खोये हैं । जिस नीति में अवसर लागत और मौद्रिक लागत, दोनों का कुल जोड़ कम हो, वही अधिक किफ़ायती होगी। अतः अगली बार अगर आप नरेगा, स्मार्ट सिटी या सर्व शिक्षा अभियान जैसी नीतियों की गुणवत्ता का विश्लेषण कर रहे हो तो पहले इस प्रश्न का उत्तर सोचिये — इस चक्कर में हमने क्या खोया और क्या पाया? और उसके बाद ही अपना मन बनाये कि यह नीति सफल थी या नहीं।

Pranay Kotasthane is a Research Fellow at The Takshashila Institution. He is on twitter @pranaykotas

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चाहतें बेशुमार, संसाधनों का तंग हाल

क्या दुर्लभ संसाधन फ्री होने चाहिए?

by Pranay Kotasthane (@pranaykotas)

कुछ दिन पहले दिल्ली सरकार ने पानी और बिजली के दाम घटा दिए। इस मामले को लेकर काफ़ी वाद-विवाद हुए । और हमेशा की तरह हम समाजवाद और पूंजीवाद जैसे बड़े-बड़े शब्दों की चपेट में आ गए। हमने यह तो पुछा ही नहीं कि किसी वस्तु की लागत के पीछे मूल कारण आख़िर है क्या?

आम तौर पर इस प्रश्न का उत्तर अर्थशास्त्र के मौलिक अभ्यास से हमें आसानी से मिल सकता है । किन्तु हमारे अर्थशास्त्र पाठ्यक्रम में हम इस प्रकार के प्रश्नों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं । ग्यारहवीं-बारहवीं के पाठ्यक्रम में पहले हम भारत की पंचवर्षीय योजनाओं को रटते हैं । तत्पश्चात हम मार्क्स या फ्रीडमैन की विचारधाराओं को एक दुसरे के विरुद्ध भिडाकर अपने हाथ धो लेते हैं । अर्थ से जुड़े इतिहास को अर्थशास्त्र कहना सरासर ग़लत है । वास्तव में अर्थशास्त्र गणित और विज्ञान जैसा एक बुनियादी विषय है जिसका उद्देश्य है मानव या एक मानवजाति के व्यवहार का आंकलन करना । कुछ क्षणों के लिए अपने दृढसिद्धान्तो के सिंहासन को त्यागकर आइये देखें कि अर्थशास्त्र हमारे मुख्य प्रश्न के बारे में क्या कहता है ।

हमारा संसार तंगी का संसार है । कहने का तात्पर्य यह कि हमारी ज़रूरतें हमारे संसाधनो से ज़्यादा होती है। अर्ज़ किया है-

غرض کے دایرہ کا مسلسل کر اضافہ

کہتا ہیں وہ ک غریب میں بھی تو ہوں

(ग़रज़ के दायरे का मसल्सल कर इज़ाफ़ा,

कहता है वो कि ग़रीब मैं भी हूँ)

यह ज़रुरत और प्राप्यता का अंतर किसी भी महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति का परिचायक है । जब यह महात्वाकांक्षी व्यक्ति एक समाज स्थापित करते हैं तो वह समाज भी महत्वाकांक्षी हो जाता है । ध्यान रहे कि यह कोई ‘मॉडर्न’ ज़माने का दोष नहीं हैं । यह अंतर समाज में प्राचीनतम काल से चला आ रहा है । पाषाण काल में भूख मिटाने के लिए शिकार बहुत थे लेकिन शिकार करने की क्षमता सिमित थी । जब इंसान खेती करने लगा तो पानी के स्त्रोत सिमित थे ।  जब इंसान मशीनें बनाने लगा तो मशीनों को बनाने के लिए दुसरे पुर्ज़े सिमित थे । इस प्रकार सिमित संसाधनो का विनिधान युगो-युगों से किसी भी अर्थव्यवस्था का केंद्रीय प्रश्न रहा है।

दुर्लभता की इस मौलिक चुनौती का जवाब समाज दो रूप से दे सकता है । पहला है नवीनीकरण। पहले शिकार को पकड़ने के लिए बहुत से लोगों की ज़रुरत होती थी यह सुनिश्चित करने के लिए कि कहीं शिकार शिकारी पर हावी न हो जाए। इस चुनौती का एक हल था — औज़ारों का ईजाद जिससे खाद्य संसाधनों का अभाव कुछ हद तक काम हुआ । इसी प्रकार खेती में पानी के अभाव को मिटाने के लिए सिंचाई के तरीकों का शोध हुआ। हालांकि नवीनीकरण का उपाय दुर्लभता को मिटा सकता है , यह प्रक्रिया अक़्सर धीमी होती है ।

तंगी से निपटने का दूसरा तरीका है चुनाव । अर्थात अपनी-अपनी ज़रुरत, हालात के आधार पर फैसला करना कि कौनसी वस्तु अधिक मूल्यवान है। इसे अंग्रेज़ी में ट्रेड-ऑफ कहा जाता है । उदाहरणार्थ परीक्षा के पहले समय सीमित होता है — जिसकी नज़र में अच्छे नंबर ज़रूरी है उसे अपने सिमित समय में फिल्म, खेल इत्यादि त्याग कर पढ़ाई पर ध्यान देना पड़ता है । इस प्रकार वह पढ़ाई को मनोरंजन के साथ ट्रेड-ऑफ करता है । जब हम इस संकल्पना को एक सामाजिक स्तर पर देखें तो पता चलता है कि हर इंसान अपने अपने विवेकानुसार संसाधनों को जुटाने के लिए जाने-अनजाने में असंख्य ट्रेड-ऑफ करते रहता है । इस प्रवृत्ति से प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न होती है — कई लोग कुछ संसाधानों को अर्जित करने की रेस का हिस्सा बन जाते है । अब फैसला यह करना है कि विनिधान किस प्रकार होगा? किसे कितना मिलेगा? किसी चीज़ की कीमत और कुछ नहीं बल्कि इसी होड़ का सिगनल है । ज़्यादा क़ीमत का मतलब है कि वह वस्तु ज़्यादा दुर्लभ है जबकि उसकी मांग कई गुना अधिक।

यह दो तरीकों के आधार पर अब हम अपने मुख्य प्रश्न की ओर लौटते हैं । स्वच्छ पानी एक दुर्लभ संसाधन है । अगर उसे मुफ्त में बाँट दिया जाए तो क्या होगा? एक, उस वस्तु की क़द्र नहीं होगी जिसके लिए बहुत छोटा ट्रेड-ऑफ करना पड़े, अर्थात लोग पहले से दुर्लभ संसाधन को व्यर्थ करने या अत्योपयोग करने के लिए प्रोत्साहित होते है । दूसरा, क्यूंकि हम पानी के अभाव पर एक झूठा पर्दा डाल देते है इसलिए भविष्य में नवीनीकरण के तरीकों का गला घोट देते हैं । इस उदाहरण में हम Rain Water Harvesting या पानी के रिसाव को रोकने इत्यादि की पहल को दबा देते हैं ।

कहने का अर्थ यह नहीं कि पानी की क़ीमत बढ़ाना ग़रीबों के ख़िलाफ़ है । ज़रूरतमंद वर्गों को सरकार और किसी रूप से सहायता कर सकती है । परन्तु क़ीमत को कृत्रिम रूप से घटाने से केवल उसका नाश होता है और उसकी गुणवत्ता भी घटती है ।

Pranay Kotasthane is a Research Fellow at The Takshashila Institution. He is on twitter @pranaykotas

 

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सामाजिक क्रांति और भारतीय संविधान : एक अद्वितीय प्रयोग

असंख्य सामाजिक कुरीतियों पर अंकुश लगाने की ज़िम्मेदारी संविधान के लिए एक कठोर परीक्षा है

– प्रणय कोटस्थाने

आम तौर पर ‘क्रांति’ और ‘संविधान’ को विरोधार्थी सन्दर्भों में समझा जाता है । क्रन्तिकारी बदलाव के बारे में सोचते हुए अक़्सर हमारे मन में आंदोलन, जोश-ख़रोश, हिंसा और विशाल जनसमूहों के चित्र सामने आ जाते हैं । वहीं संवैधानिक बदलाव के साथ हम अक़्सर समझौते, धीमें बदलाव, विचार-विमर्श वगैरह जैसी मंद क्रियाएँ जोड़ देते हैं । केवल भारतीय संविधान ही एक ऐसा प्रयोग है जो इन दोनों भिन्न धारणाओं को व्यापक तौर पर साथ ला सका है ।

संविधान को सामजिक बदलाव का मुख्य एजेंट बनाना न केवल एक साहसिक प्रयोग था, यह एक अद्वितीय कदम भी था । साहसिक इसलिए क्यूंकि १९४७ तक भारतीय समाज नाना प्रकार की कुरीतियों की वजह से खोखला हो चूका था । जातिवाद, साम्प्रदायिकता, भूखमरी और गरीबी ने समाज को कमज़ोर बना दिया था । ऐसे वक़्त पर हमारे संविधान के रचयिताओं ने इन समस्याओं का ख़ात्मा करने का बीड़ा उठाया । साथ ही यह कदम अद्वितीय इसलिए था क्यूंकि उस वक़्त तक किसी भी संविधान ने क्रान्ति लाने का जिम्मा नहीं उठाया था । उदराहणार्थ , अगर हम अमरीकी संविधान पर नज़र डाले तो पता चलता है कि वह एक कन्सर्वेटिव रचना है । उसमें  केवल उस समय के मानदंडों की रक्षा करने का भाव है ।

संविधान रचयिताओं की यह असाधारण पहल ज़रूरी भी थी और शायद सही भी थी , किन्तु इस प्रयोग के कुछ साइड इफेक्ट्स भी हुए जो आज तक चले आ रहें हैं और जिन्हें समझना ज्ञानवर्धक होगा ।

एक, इस क्रांतिकारी बदलाव की कोशिश ने पूरे संविधान की वैधता पर सवालिया निशान लगा दिए । जो लोग सदियों से जात-पात या दहेजप्रथा जैसी दक़ियानूसी बातों में विश्वास रखते थे , वे यह पूछने लगे कि चंद लोगों के कल लिखे हुए कुछ  पन्नें आखिर किस रूप से प्राचीन रीति रिवाजों से बेहतर हैं ? ऐसा सोचने वाले आज भी मौजूद हैं खाप पंचायतों के रूप में जो गोत्र और जाति जैसी मनघड़ंत बातों पर आँख मूँद कर विश्वास रखने पर आमादा हैं । और जब कुछ लोग संविधान के एक क्षेत्र को नकारने लगें तो इस अवैधता का डर संविधान के अन्य क्षेत्रों को भी सताने लगा । उदाहरणार्थ, जो संविधान की छुआछूत उन्मूलन के सविचार के विरोध में थे, वह संविधान के धर्मनिरपेक्ष प्रावधानों को भी धिक्कारने लगे ।

दूसरा, सामाजिक परिवर्तन का जिम्मा उठाने की वजह से भारत गणराज्य का काम कई गुना बढ़ गया । कौटिल्य अर्थशास्त्र में कहा गया है कि राज्य के अभाव में मत्स्यन्याय की अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति अपने बल के आधार पर अपने से कमज़ोर व्यक्तियों के साथ जैसा चाहे व्यवहार कर सकता है । अतः राज्य का स्थापन मत्स्यन्याय की स्थिति का अंत करने के लिए हुआ। चाहे राजतंत्र हो या लोकतंत्र, राज्य की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है हर व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना, चाहे वह कितना ही कमज़ोर क्यों न हो । इस धारणा को rule of law कहा जाता है और हम अपनी ओर ही देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि हमारा गणराज्य इस मुख्य उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाया है । ऐसी नाज़ुक अवस्था में भारतीय गणराज्य ने सामाजिक परिवर्तन का एक और महाकार्य अपने कन्धों पर ले लिया जिससे राज्य की कठिनाईयाँ और बढ़ गयी । उदाहरणार्थ, एक पुलिस अफसर का कार्य सिर्फ कानून की रक्षा करने तक सीमित नहीं है – उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि दहेज, छुआछुत जैसे प्रकरण समाज में ना हो पाए ।

इन दोनों नकारात्मक पहलुओं का तात्पर्य यह नहीं कि हमें अपने संवैधानिक मार्ग त्याग दे, बल्कि हमें इस बोल्ड प्रयोग को सफल बनाने की और दृढ़ता से मेहनत करनी चाहिए । शायद हमारा गणराज्य निर्दोष नहीं , लेकिन यह हमारा सर्वश्रेष्ठ विकल्प हैं । इसके सारे पहलुओं पर रोशनी डालने से हम इसको बेहतर समझ पाएंगे । आख़िर इसकी सफलता में ही हम सबकी कामयाबी है ।

Pranay Kotasthane is a Policy Analyst at The Takshashila Institution. He is on twitter at @pranaykotas.

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Mature arguments please!

By Pranay Kotasthane

October 16th is celebrated every year around the world as “World Food Day” in the honour of the date of establishment of the Food and Agriculture Organization (FAO) in 1945. Incidentally, ‘food’ has been trending in the Indian policy discourse as well, over the last few months. The primary reason for this subject to garner attention in India is due to the National Food Security Act 2013 (NFSA), which was signed into a law almost a month before the World Food Day. The arguments put forward by policy makers in favor of this act are half-baked at best and untrue or unclear at worst. There are essentially three major problems with these arguments:

First, the arguments start and end on one single bullet point

All policy discourse by groups and individuals lauding the act have one single basis – that India has around 860 million people living on an income of less than $2 a day and hence are in a grave need of assistance from the state. The narrative further says that the earnings of this section are so little that it is unable to afford food and thus  the government needs to step in and provide rice, wheat and coarse grains at heavily reduced prices. As an example of how shallow these arguments are, have a look at the video here. The arguments target the problem of poverty and suggest a solution based on an assumption that providing heavily subsidised grains will bring an end to India’s problems of hunger and malnutrition in one shot. However, such an argument is just not good enough. It lacks sufficient evidence to prove its effectiveness in handling the problem of poverty. Many states like Tamil Nadu and Chhattisgarh have already implemented similar Food Security Acts in the past and thus there should be enough data available to study the impact of these acts on the people of these regions. A more potent argument, therefore would be to give the numbers of how these states have brought down hunger and increased the standards of living for the people. If there is credible evidence to prove that this has indeed happened, then no cost is high enough for the state to bring in such a legislation to benefit the needy.

Second, The Act aims to solve a problem that exists at a much smaller scale than we are made to believe

The argument that 860 million people (67 percent of the population) in India, are hungry is incorrect and baseless. In fact hunger is not a problem in India anymore. As the government’s own NSSO data of 2009-10 reveals, the proportion of households not getting two square meals a day is about 1 per cent in rural India and 0.4 percent in urban India in 2009-10. So shouldn’t it be a priority of the state to look after these unfortunate 1 percent of the population alone instead of giving freebies to the remaining 66 percent?

Third: The arguments conveniently neglect opportunity costs.

Even though around 99 percent households of India are not hungry anymore, 48 percent of Indian children are malnourished and hence stunted. Many studies have indicated that the lack of sanitation is the cause of malnutrition and stunted growth in India. Shouldn’t the policy discourse then shift from hunger to malnutrition and sanitation? Providing subsidised grains will not help in tackling the problem of malnutrition. In fact, the huge procurement targets may end up forcing farmers to grow grains instead of vegetables, making these nourishment foods further out of the reach of the needy. If the government commits a spending which ranges anywhere from 1,25,00 crore (1.2 percent of GDP) to 3,14,000 (3 percent of GDP) crore annually, isn’t it losing out on the opportunity of utilising these funds for the better and more relevant issues of malnutrition and sanitation. Moreover, as we have come to learn, entitlements in India have no expiry date. So the wrong policies of the day will continue to haunt the nation for a long time in future as well.

These are some of the questions that the policy makers need to explain to the citizens. Political parties in a democracy can afford to be swayed by populist schemes, but policy makers need to make mature arguments supporting their proposals.

Pranay Kotasthane is a VLSI professional. He is a student of the Takshashila GCPP-5 batch. He blogs at pramaanik.wordpress.com and is on twitter as @pranaykotas.

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