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पारम्परिक सुरक्षा नीति को नेटवर्क—समाजों की पुरज़ोर चुनौती

कहानी पारम्परिक श्रेणीबद्ध सरकार और एक नेटवर्क-समाज के बीच के संघर्ष की

by Pranay Kotasthane (@pranaykotas)

गत १ अगस्त को ट्विटर पर कोलकाता में दंगे की तेज़—तर्रार अफवाहों ने पुलिस और राजकीय प्रशासन को क्लीन बोल्ड कर दिया। इस कहानी को विस्तार से जानने के लिए शोएब दान्याल का यह लेख पढ़ें। संक्षिप्त में हुआ यह कि रेलवे पुलिस ने १ अगस्त को मदरसों के कुछ छात्रों को सियालदाह स्टेशन से पकड़कर बारासात के एक युवा कल्याण होम भेज दिया। अगले दिन सियालदाह के स्थानीय नागरिकों ने पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन किया और कोलकाता का एक मुख्य मार्ग रोक दिया। जवाब में पुलिस ने बड़ी संख्या में तैनाती की। कुछ तनावपूर्ण घंटों के उपरांत रात तक भीड़ गायब हो गयी।

लेकिन ट्विटर पर रात को कुछ और ही ड्रामा चल रहा था। लोगों ने अफवाह फैलाना शुरू कर दिया कि कोलकाता के मुस्लिमबहुल इलाकों में आतंक फ़ैल चुका है। कई सौं ट्वीट और हज़ारों रीट्वीट के बाद इस अफवाह ने साम्प्रदायिक रंग ले लिया। लेकिन किसी वजह से यह कारस्तानी सफल नहीं हुई और मंगलवार तक जन स्थिति सामान्य हो गयी।

अब एक दूसरा उदाहरण देखें — बेंगलुरु में २९ दिसंबर को चर्च स्ट्रीट नामक एक लोकप्रिय स्पॉट पर एक विस्फोट हुआ जिसमे एक महिला की जान चली गयी। ट्विटर पर यह ख़बर कुछ ऐसे फैली —

पहला ट्वीट: चर्च स्ट्रीट पर ब्लास्ट।

दूसरा ट्वीट: चर्च के नज़दीक ब्लास्ट।

तीसरा ट्वीट: बैंगलोर के एक चर्च में ब्लास्ट!

उपर्लिखित दोनों घटनाओं के आधार पर कोई भी समझदार व्यक्ति इस तरह के विषैले प्रचार के नतीजे का अनुमान लगा सकता है। इस तरह की अफवाहें न सिर्फ कहा—सुनी के आधार पर होती है, बल्कि एक सिस्टमैटिक अंदाज़ से दोहराई जा सकती है। हो सकता है कि भारत के कट्टर विरोधी राष्ट्रों की इंटेलिजेंस एजेन्सियों का एक विभाग इस तरह के ऑनलाइन प्रचार के लिए तैयार किया जा रहा हो। अतः यह अनिवार्य है कि हम इंटरनेट में इंफॉर्मेशन के संचालन को बेहतर रूप से समझे। इस प्रकार के विश्लेषण के आधार पर सरकारें इंटरनेट से आने वाले खतरों का सटीक जवाब दे पाएँगी।

मूलतः उपर्लिखित दोनों प्रसंग, पारम्परिक सरकार की संरचना और एक नेटवर्क-समाज के बीच के संघर्ष का परिचायक है। आज का समाज एक नेटवर्क-समाज हैं। ऐसे समाज में इंसान एक दुसरे से नेटवर्क के ज़रिये बड़ी तेज़ी से दूरियों को लांघ सकते हैं । साथ ही, नेटवर्क—समाज का हर सदस्य न सिर्फ खबरों का उपभोग करता है, बल्कि वह खबरों का रचयिता भी है। इंटरनेट का यह श्रेणीविहीन व्यक्तित्व ही उसकी सबसे बड़ी ताक़त है जिसकी वजह से हमारा जीवन मूलभूत रूप से तब्दील हो चुका है।

दूसरी और सरकारें आज भी श्रेणीबद्ध है । इस संरचना के चलते इंफॉर्मेशन का प्रवाह सरकारों में नीचे तबके से ऊपर की ऒर होता है | जबकि नतीजे ऊपर से नीचे की ऒर प्रवाह करते हैं । यह क्रमबद्ध प्रवाह का स्वभाव धीमा होता है । अतः नेटवर्क—समाज की जुटाव (mobilisation) की गति सरकारों की प्रतिक्रिया की गति से कई गुना अधिक है। तो सवाल यह है कि  सरकारों के पास क्या विकल्प हैं?

एक विकल्प हैं नेटवर्क को बहुत बारीकी से नियंत्रित करना। जब भी अफवाह फैलने लगे तो इंफॉर्मेशन प्रवाहों को ब्लॉक कर देना। यह मॉडल चीन में कई परिवेशों में आज़माया जा चुका है । लेकिन नेटवर्क के फैलाव और लगातार बढ़ते स्त्रोतों को मद्देनज़र रखते हुए यह विकल्प असरहीन हो रहा है। साथ ही, भारत सरकार को अपने देशवासियों पर जासूसी करना, हमारे गणतांत्रिक संविधान का उल्लंघन होगा।

दूसरा विकल्प है कि सरकारें खुद अपनी संरचना को बदले, और नेटवर्क की मांग के अनुसार ढाल लें। इस विकल्प की  झलक बैंगलोर के चर्च स्ट्रीट हादसे के बाद दिखी जब अफवाहों को बंद करने के लिए कुछ ही मिनटों में बैंगलोर पुलिस के आला अफसरों ने ट्विटर और फेसबुकपर सही जानकारी को लोगों के साथ बाँटा। यह प्रत्युत्तर असरदायी रहा क्यूंकि कई समय से बैंगलोर पुलिस सभी डिजिटल मीडिया पर सक्रिय है। नागरिकों की समस्याओं और सुझावों का शालीनता से उत्तर भी देती है । अतः बैंगलोर पुलिस डिपार्टमेंट डिजिटल मीडिया में एक विश्वसनीय पात्र के रूप में स्थापित हुआ है। इस  उदहारण को सुरक्षा नीति का महत्त्वपूर्ण अंग बनाने की आवश्यकता है।

इसी तरह सरकारों को नेटवर्क के कईं और पहलू अपनाने भी होंगे और नेटवर्क शैली में पारंगत भी होना पड़ेगा । तभी हमारी सुरक्षा नीति नेटवर्क—समाज की चुनौती का सामना कर पाएगी।

(This post also appeared on NDTV India blogs)

Pranay Kotasthane is a Research Fellow at The Takshashila Institution. He is on twitter @pranaykotas

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“नोतुन प्रजन्मो — नई दिशा” : भारतीय विदेश नीति के बदलते समीकरण

बांग्लादेश दौरे से कुछ ऐसे समीकरण सामने आ रहे हैं जो भारतीय विदेश नीति के प्रभाव का परिचायक बनेंगे

by Pranay Kotasthane (@pranaykotas) and Pradip Bhandari

जून ७ को भारत और बांग्लादेश ने “नोतुन प्रजन्मो — नई दिशा” नामक संयुक्त घोषणापत्र से अपने द्विपक्षीय संबंधों को एक नया आयाम दिया। प्रधानमंत्री की इस यात्रा में भूमि सीमा समझौते पर मोहर लग गई। समुद्रीय सीमा के पारस्परिक समाधान के उपरांत यह भूमि सीमा समझौता दोनों देशों के रिश्तों में दूसरी लगातार सफलता हैं।

इन दो बाधाओं के हटने से दोनों देश अपनी प्रमुख मांगों को एक दुसरे के सामने बेजिझक रूप से रखने में सफल रहे । जहाँ भारत ने बांग्लादेश से अपने पूर्वोत्तर राज्यों के बांग्लादेश से अभिगम (access) की मांग में सीमित सफलता पाई, बांग्लादेश ने तीस्ता मसले को जल्द निपटाने की बात उठाई।

हालांकि इन मामलों का पूर्ण समाधान अभी दूर है, इन नुकिलें विषयों पर खुलकर बातचीत ही अपनेआप में एक मील का पत्थर है । इन दोनों विषयों पर प्रगति ही भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय साझेदारी को निर्धारित करेगी । साथ ही, इस दौरे से कुछ ऐसे समीकरण सामने आ रहे हैं जो भारतीय विदेश नीति के प्रभाव का परिचायक बनेंगे। आइए, इन समीकरणों पर ध्यान केंद्रित करें।

सर्वप्रथम, यह स्पष्ट हो चुका है कि भारत अपनी विदेश नीति में दोस्ताना पड़ोसी राष्ट्रों को प्राथमिकता देगा । इससे पहले भारत की विदेश नीति प्राथमिकता थी पाकिस्तान के साथ सर्व विवादों पर शांतिपूर्ण समझौता। इस प्राथमिकता के चलते दुसरे पड़ोसियों से रिश्ते और सुदृढ़ करना मुश्किल हो गया था क्यूंकि हमारा ध्यान पाकिस्तान पर केंद्रित था । सार्क (SAARC) जैसे बहुराष्ट्रीय मंच भी पाकिस्तान की कटुता के चलते प्रभावहीन हो गए। लेकिन अब, इस सरकार ने साफ़ कर दिया हैँ कि पाकिस्तान को उतना ही महत्व दिया जाएगा जितना वह उसका हकदार है। रक्षा मंत्री के पाकिस्तान के ख़िलाफ़ आतंकवाद पर वक्तव्य के अलावा, सरकार की पाकिस्तान नीति अब तक भारतीय राष्ट्रहित के लिए सकारात्मक रही है।

दूसरा, इस दौरे की सफलता से यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत को पड़ोसी राष्ट्रों के दोस्ताना राजनायकों को प्रोत्साहन देना चाहिए। फिर चाहे वह मालदीव हो, बांग्लादेश हो  या श्रीलंका, अगर कोई राजनेता भारत-समर्थक है, तो भारत को खुलकर दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहिए। अगर ऐसे राजनेताओं की शुभकामनाओं के लिए हमे कुछ अतिरिक्त जतन करने पड़े, तो करने चाहिए।  इस तरह भारत एक सशक्त संकेत प्रसारित करेगा कि जो नेता भारत के शुभ चिंतक हैं, उन्हें भारत मुश्किल क्षणों में भी सहायता करने का सामर्थ्य रखता हैं ।

तीसरा समीकरण है भारतीय राज्यों की विदेश नीति मैं बढ़ती भागीदारी। भूमि सीमा समझौते पर हस्ताक्षर के वक्त पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की मौजुदगी विदेश नीति मैं राज्यों की बढ़ती साझेदारी की तरफ संकेत करती है। यह इस बात का प्रमाण है कि केंद्र सरकार को यह अहसास हो चुका है कि ‘पड़ोसी पहले’ की नीति तभी सफल हो सकती है जब सीमा स्थित राज्यों को भी भागीदार बनाया जाए। साथ ही यह सरकार की ‘कॉपरेटिव फेडेरलिस्म’ की नीति के साथ भी समन्वय रखता है।

चौथा समीकरण है यह एहसास कि पड़ोसियों से बातचीत में सार्क जैसे बहुपक्षीय मंच की बजाय अलग-अलग द्विपक्षीय साझेदारियां बेहतर काम करती हैं । सार्क में पाकिस्तान की उपस्थिति से आसान कार्य भी पेचीदा हो जाते हैं । और ऐसी कोई भी भारतीय मांग नहीं हैं जो केवल सार्क मंच पर की जा सकती है, द्विपक्षीय स्तर पर नहीं । अतः सार्क में अपनी शक्ति ज़ाया करने से अच्छा है कि भारत आत्मविश्वास से द्विपक्षीय साझेदारियों का एक सशक्त नेटवर्क स्थापित करें।  

“नोतुन प्रजन्मो — नई दिशा” अर्थात “नयी पीढ़ी—नयी दिशा” का नारा क्या भारत विदेश नीति का भी परिचायक होगा?

यह तो उपर्लिखित चार समीकरण निर्धारित करेंगे। फिलहाल, हमें इस बात पर ध्यान देना है कि यह समीकरण स्वतः भारतीय गणतंत्र की घरेलु सफलता पर आधारित हैं। इस सफ़लता के लिए हमें आर्थिक स्तर पर वृद्धि और सामाजिक स्तर  पर सद्भावना की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे ।

Pranay Kotasthane is a Research Fellow at The Takshashila Institution. He is on twitter @pranaykotasPradip Bhandari is a student of the GCPP3 batch. He is the Coordinator, Youth Forum of Thalassemia & Child Welfare Group, in Indore.

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फायदा अठन्नी का और खर्चा एक रुपये का

कहानी विनिमय लागत (transaction cost) की 

— प्रखर मिश्रा (@prakharmisra) और प्रणय कोटस्थाने (@pranaykotas)

इस श्रृंखला के पिछले अध्याय में हमने अवसर लागत की संकल्पना को समझा । इस पोस्ट में हम एक और ऐसी लागत से परिचय करेंगे, जिससे हमारा पाला तो हर रोज़ पड़ता है पर हम उससे जुड़े कारण और अन्य पहलुओं को अक़्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं ।

मान लीजिये कि आपको एक १०,००० रुपये का टेलीविज़न ख़रीदना है। एक सुपरस्टोर (जो आपके निकटतम टेलीविज़न स्टोर से १० किलोमीटर दूर है) में १० प्रतिशत छुट का इश्तेहार आपको यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि कौनसा सौदा अधिक फ़ायदेमंद है? अगर हम केवल दोनों दुकानो में टी.वी. की क़ीमत मात्र के आधार पर फ़ैसला करें तो सुपरस्टोर निस्संदेह बेहतर विकल्प हैं।

पर अगर हम इस समस्या को बारिकी से देखें तो जानेंगे कि  जवाब इतना आसान नहीं है । मसलन, आप इस १० किलोमीटर दूर सुपरस्टोर तक कार में पहुँचने की अतिरिक्त लागत जोडें । फिर सुपरमार्केट में कार पार्किंग की क़ीमत जोड़े। इस पूरे प्रकरण में अपने ज़ाया किये गए वक़्त की अवसर लागत जोड़े। जब आप इन लागतों की गणना करेंगे, तो पाएंगे कि अधिक फ़ायदे वाला विकल्प निकटतम स्टोर से संतुष्ट रहने में भी हो सकता है ।

इस उदहारण से हम यह समझते हैं कि किसी भी ख़रीदी की कुल लागत के दो हिस्से होते हैं । एक — ख़रीदी गयी वस्तु की क़ीमत और दो — वह लागत जो इस विनिमय को अंजाम देने की प्रक्रिया में खर्च होती है । इसी कुल लागत के दुसरे हिस्से को “विनिमय लागत” कहा जाता है ।

साथ हीकिसी भी विनिमय के तीन अंग हो सकते हैं —

१. शोधकार्य: विनिमय की पहली कड़ी है शोध। एक ख़रीददार को शोध होती है ऐसे बेचने वाले की, जो उसके बजट में उसे अपनी मनपसंद वस्तु बेच सके । उदाहरणार्थ, इंटरनेट की लोकप्रियता से पहले की बात है — लोग शॉपिंग के नाम पर दर-बदर दुकानों के चक्कर लगाते थे क़ीमत का अंदाज़ा लगाने के लिए । साथ ही दुकान वालों को ठीक खरीददार ढूंढने के लिए पोस्टर-पर्ची में पैसे लगाने पड़ते थे। इस शोध प्रक्रिया में ज़ाया हुए संसाधन विनिमय लागत का अहम हिस्सा है।

२. मोल-तोल प्रक्रिया: सौदेबाज़ी की प्रक्रिया में ज़ाया संसाधन भी विनिमय लागत का हिस्सा है । अगर मोल-तोल करना दुःखदायी हो तो विनिमय लागत इतनी बढ़ सकती है कि सौदा होता ही नहीं । उदहारण के लिए, कुछ ऑटो-रिक्शा चालक मीटर का उपयोग किये बिना हर ग्राहक से मोल-तोल का सौदा करने के इच्छुक होते हैं । यह प्रक्रिया हर दिन यात्रियों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है, अर्थात उन्हें यह लागत बहुत अधिक लगती है । नतीजतन, कई लोग ऑटो न लेकर, अधिक रेट पर टैक्सी/कैब लेना पसंद करते हैं । अतः, जितना ज़्यादा मोल-तोल, उतनी ज़्यादा विनिमय लागत ।

३. नीति और लागू लागत: विनिमय का एक बड़ा हिस्सा है कि तय हुई शर्तों का पालन हो । अगर तय शर्तों को लागू करने की लागत बहुत अधिक हो, तो सौदा नहीं होता। उदहारण के लिए, अगर आपके द्वारा ख़रीदे हुए नए कपड़े पहली ही धुलाई में रंग छोड़ने लगें, तो आप चाहेंगे कि इस नुकसान का जल्द भरपाया हो । अगर बेचने वाला यह नुक़सान भरने से आनाकानी करें, तो यह सौदा महंगा हो जाता है । इसी वजह से अक़्सर वारंटी का उपयोग किया जाता है । वारंटी एक सिग्नल है ग्राहक के लिए कि इस विनिमय को लागू करने की लागत कम से कम होगी ।

नोट कीजिये किस तरह इंटरनेट से विनिमय लागत कम हुई है और आप जान जाएंगे कि ऑनलाइन शॉपिंग की सफ़लता का राज़ क्या है!

विनिमय लागत का पब्लिक पॉलिसी से क्या लेना देना?
विनिमय लागत किसी भी आर्थिक गतिविधि पर बोझ है । यह लागत बेचने वाले को भी अदा करनी पड़ती है और खर्च करने वाले को भी। उसे शुन्य भी नहीं किया जा सकता । जितनी ज़्यादा विनिमय लागत, उतना कम प्रोत्साहन एक आर्थिक गतिविधि के लिए । जब विनिमय लागत बहुत अधिक हो जाती है तो आर्थिक विकास में बाधा डालती है।

बाज़ार कई ग्राहकों और कई बेचने वालों को एक स्थान पर लाकर विनिमय लागत कम करते हैं|Image courtesy: McKay Savage, Flickr

बाज़ार कई ग्राहकों और कई बेचने वालों को एक स्थान पर लाकर विनिमय लागत कम करते हैं| Image courtesy: McKay Savage, Flickr

उदहारण ले सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी Public Distribution System (PDS) का। कई बार इस प्रणाली के फायदों से ग़रीब भी वंचित रह जाता है । इसका कारण भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि अत्यधिक विनिमय लागत का है। दूर-दराज़ से एक PDS दूकान आने का खर्चा, लाइनों में खड़ा रहकर एक-आधे दिन का वेतन गँवाने की अवसर लागत और गुणवत्ता लागू करने की बड़ी लागत को मद्देनज़र रख कर कई लोग खुले बाज़ार से ही अन्न ख़रीदना पसंद करते हैं ।

अतः, अच्छी पॉलिसी वह होती है जो विनिमय लागत को कम रख सके — बेचने वाले के लिए भी  भी और ख़रीदने वाले के लिए भी। ऐसा न करने पर फायदा होता है अठन्नी का और खर्चा होता है एक रुपये का

Prakhar Misra is a Fellow at the Swaniti Initiative and is a Takshashila GCPP alumnus. He is on twitter @prakharmisra

Pranay Kotasthane is a Research Fellow at The Takshashila Institution. He is on twitter @pranaykotas

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कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है

यह कहावत न सिर्फ एक दार्शनिक सिद्धांत है, बल्कि एक आर्थिक तथ्य भी है।

by Pranay Kotasthane (@pranaykotas)

ऊपर लिखित कहावत का प्रयोग हमने असंख्य बार सुना है । लेकिन इस संकल्पना को अर्थशास्त्र में कैसे समझा जाता है,  आइये जाने—
इस ब्लॉग श्रृंखला के पिछले प्रकरण में हमने देखा था कि तंगी से निपटने का एक तरीका है चुनाव — अर्थात अपनी-अपनी ज़रुरत और हालात के आधार पर किया गया वह फैसला जो हमारी व्यक्तिगत पसंद का परिचायक होता है । इस चुनाव को अंग्रेज़ी में ट्रेड-ऑफ कहा जाता है ।

जब भी हम अपने एक सीमित संसाधन के बदले में किसी एक चीज़ का चुनाव करते हैं तो किसी दूसरी चीज़ को जाने-अनजाने त्याग देते हैं। उदाहरणार्थ, एक ग्रेजुएट युवक/युवती के लिए एक सीमित संसाधन होता है समय। मूल्यवान संसाधन इसलिए क्यूंकि इस अवस्था में ज़िम्मेदारियाँ अक्सर काम होती हैं । सीमित इसलिए क्यूंकि  बेपरवाह जीवन बनाये रखना हमेशा संभव नहीं होता। मान लीजिये,अब इस ग्रेजुएट के सामने अपने संसाधन का उपयोग करने के केवल दो तरीके हैं — एक, ग्रेजुएशन के बाद किसी अच्छी जगह कार्यरत होना और दूसरा, पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स करना।

विकल्प आप कोई भी चुनें, उससे जुडी लागत को व्यय करना पड़ता है और यह लागत सिर्फ मौद्रिक (monetary) नहीं होती । अगर आप पोस्ट-ग्रेजुएशन का मार्ग चुनते हैं तो आप कॉलेज की फीस, ऍप्लिकेशन इत्यादि की मौद्रिक लागत उठाते हैं। लेकिन लागत सिर्फ इतनी नहीं है — इस विकल्प को चुनते ही आप कुछ सालों के लिए एक फुल-टाइम तनख़्वाह कमाने का मौक़ा भी खो देते हैं और यह भी आपकी कुल आर्थिक लागत का हिस्सा है। उसी तरह आप अगर एक फुल-टाइम जॉब का विकल्प चुनते हैं तो मौद्रिक लागत के रूप में नए शहर में सेटल होने के लिए एक मौद्रिक लागत उठाते हैं । साथ ही आप एक मास्टर्स/डॉक्टर की उपाधि हासिल करने का मौका गवाते हैं, और यह भी आपकी लागत का एक अहम हिस्सा है । इस संकल्पना को जो हमारे खोये हुए मौक़े की लागत को दर्शाती है, अवसर लागत (Opportunity Cost) कहते हैं।

अत:, किसी भी ट्रेड-ऑफ की कुल आर्थिक लागत जाननी हो तो हमें अवसर लागत को भी कुछ इस तरह सम्मिलित करना पड़ेगा —

कुल आर्थिक लागत = मौद्रिक लागत + अवसर लागत

ध्यान रहे कि कई बार अवसर लागत को एक सटीक नंबर देना मुश्किल होता है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं हैं कि हम इसको अपने विश्लेषण से हटा दे। बल्कि हमें इस पर और ज़्यादा धान देना चाहिए, क्यूंकि एक विकल्प की मौद्रिक लागत कम होते हुए भी कुल लागत कई गुना हो सकती है अगर उसकी अवसर लागत बहुत अधिक हो।

अवसर लागत की संकल्पना हमें पब्लिक पॉलिसी में किस प्रकार मददगार होती है? इस प्रकार कि सरकार के पास संसाधन हैं सीमित और ज़िम्मेदारियाँ हैं हज़ार। सरकार की हर नीति से एक अवसर लागत जुडी है । इसीलिए अगर हमें एक पॉलिसी की गुणवत्ता का विश्लेषण करना हो तो ना सिर्फ उस पर ज़ाया खर्च और मिलने वाले फायदे को जानना होगा, बल्कि यह भी देखना कि इस विकल्प को चुनकर हमने क्या मौके खोये हैं । जिस नीति में अवसर लागत और मौद्रिक लागत, दोनों का कुल जोड़ कम हो, वही अधिक किफ़ायती होगी। अतः अगली बार अगर आप नरेगा, स्मार्ट सिटी या सर्व शिक्षा अभियान जैसी नीतियों की गुणवत्ता का विश्लेषण कर रहे हो तो पहले इस प्रश्न का उत्तर सोचिये — इस चक्कर में हमने क्या खोया और क्या पाया? और उसके बाद ही अपना मन बनाये कि यह नीति सफल थी या नहीं।

Pranay Kotasthane is a Research Fellow at The Takshashila Institution. He is on twitter @pranaykotas

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चाहतें बेशुमार, संसाधनों का तंग हाल

क्या दुर्लभ संसाधन फ्री होने चाहिए?

by Pranay Kotasthane (@pranaykotas)

कुछ दिन पहले दिल्ली सरकार ने पानी और बिजली के दाम घटा दिए। इस मामले को लेकर काफ़ी वाद-विवाद हुए । और हमेशा की तरह हम समाजवाद और पूंजीवाद जैसे बड़े-बड़े शब्दों की चपेट में आ गए। हमने यह तो पुछा ही नहीं कि किसी वस्तु की लागत के पीछे मूल कारण आख़िर है क्या?

आम तौर पर इस प्रश्न का उत्तर अर्थशास्त्र के मौलिक अभ्यास से हमें आसानी से मिल सकता है । किन्तु हमारे अर्थशास्त्र पाठ्यक्रम में हम इस प्रकार के प्रश्नों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं । ग्यारहवीं-बारहवीं के पाठ्यक्रम में पहले हम भारत की पंचवर्षीय योजनाओं को रटते हैं । तत्पश्चात हम मार्क्स या फ्रीडमैन की विचारधाराओं को एक दुसरे के विरुद्ध भिडाकर अपने हाथ धो लेते हैं । अर्थ से जुड़े इतिहास को अर्थशास्त्र कहना सरासर ग़लत है । वास्तव में अर्थशास्त्र गणित और विज्ञान जैसा एक बुनियादी विषय है जिसका उद्देश्य है मानव या एक मानवजाति के व्यवहार का आंकलन करना । कुछ क्षणों के लिए अपने दृढसिद्धान्तो के सिंहासन को त्यागकर आइये देखें कि अर्थशास्त्र हमारे मुख्य प्रश्न के बारे में क्या कहता है ।

हमारा संसार तंगी का संसार है । कहने का तात्पर्य यह कि हमारी ज़रूरतें हमारे संसाधनो से ज़्यादा होती है। अर्ज़ किया है-

غرض کے دایرہ کا مسلسل کر اضافہ

کہتا ہیں وہ ک غریب میں بھی تو ہوں

(ग़रज़ के दायरे का मसल्सल कर इज़ाफ़ा,

कहता है वो कि ग़रीब मैं भी हूँ)

यह ज़रुरत और प्राप्यता का अंतर किसी भी महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति का परिचायक है । जब यह महात्वाकांक्षी व्यक्ति एक समाज स्थापित करते हैं तो वह समाज भी महत्वाकांक्षी हो जाता है । ध्यान रहे कि यह कोई ‘मॉडर्न’ ज़माने का दोष नहीं हैं । यह अंतर समाज में प्राचीनतम काल से चला आ रहा है । पाषाण काल में भूख मिटाने के लिए शिकार बहुत थे लेकिन शिकार करने की क्षमता सिमित थी । जब इंसान खेती करने लगा तो पानी के स्त्रोत सिमित थे ।  जब इंसान मशीनें बनाने लगा तो मशीनों को बनाने के लिए दुसरे पुर्ज़े सिमित थे । इस प्रकार सिमित संसाधनो का विनिधान युगो-युगों से किसी भी अर्थव्यवस्था का केंद्रीय प्रश्न रहा है।

दुर्लभता की इस मौलिक चुनौती का जवाब समाज दो रूप से दे सकता है । पहला है नवीनीकरण। पहले शिकार को पकड़ने के लिए बहुत से लोगों की ज़रुरत होती थी यह सुनिश्चित करने के लिए कि कहीं शिकार शिकारी पर हावी न हो जाए। इस चुनौती का एक हल था — औज़ारों का ईजाद जिससे खाद्य संसाधनों का अभाव कुछ हद तक काम हुआ । इसी प्रकार खेती में पानी के अभाव को मिटाने के लिए सिंचाई के तरीकों का शोध हुआ। हालांकि नवीनीकरण का उपाय दुर्लभता को मिटा सकता है , यह प्रक्रिया अक़्सर धीमी होती है ।

तंगी से निपटने का दूसरा तरीका है चुनाव । अर्थात अपनी-अपनी ज़रुरत, हालात के आधार पर फैसला करना कि कौनसी वस्तु अधिक मूल्यवान है। इसे अंग्रेज़ी में ट्रेड-ऑफ कहा जाता है । उदाहरणार्थ परीक्षा के पहले समय सीमित होता है — जिसकी नज़र में अच्छे नंबर ज़रूरी है उसे अपने सिमित समय में फिल्म, खेल इत्यादि त्याग कर पढ़ाई पर ध्यान देना पड़ता है । इस प्रकार वह पढ़ाई को मनोरंजन के साथ ट्रेड-ऑफ करता है । जब हम इस संकल्पना को एक सामाजिक स्तर पर देखें तो पता चलता है कि हर इंसान अपने अपने विवेकानुसार संसाधनों को जुटाने के लिए जाने-अनजाने में असंख्य ट्रेड-ऑफ करते रहता है । इस प्रवृत्ति से प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न होती है — कई लोग कुछ संसाधानों को अर्जित करने की रेस का हिस्सा बन जाते है । अब फैसला यह करना है कि विनिधान किस प्रकार होगा? किसे कितना मिलेगा? किसी चीज़ की कीमत और कुछ नहीं बल्कि इसी होड़ का सिगनल है । ज़्यादा क़ीमत का मतलब है कि वह वस्तु ज़्यादा दुर्लभ है जबकि उसकी मांग कई गुना अधिक।

यह दो तरीकों के आधार पर अब हम अपने मुख्य प्रश्न की ओर लौटते हैं । स्वच्छ पानी एक दुर्लभ संसाधन है । अगर उसे मुफ्त में बाँट दिया जाए तो क्या होगा? एक, उस वस्तु की क़द्र नहीं होगी जिसके लिए बहुत छोटा ट्रेड-ऑफ करना पड़े, अर्थात लोग पहले से दुर्लभ संसाधन को व्यर्थ करने या अत्योपयोग करने के लिए प्रोत्साहित होते है । दूसरा, क्यूंकि हम पानी के अभाव पर एक झूठा पर्दा डाल देते है इसलिए भविष्य में नवीनीकरण के तरीकों का गला घोट देते हैं । इस उदाहरण में हम Rain Water Harvesting या पानी के रिसाव को रोकने इत्यादि की पहल को दबा देते हैं ।

कहने का अर्थ यह नहीं कि पानी की क़ीमत बढ़ाना ग़रीबों के ख़िलाफ़ है । ज़रूरतमंद वर्गों को सरकार और किसी रूप से सहायता कर सकती है । परन्तु क़ीमत को कृत्रिम रूप से घटाने से केवल उसका नाश होता है और उसकी गुणवत्ता भी घटती है ।

Pranay Kotasthane is a Research Fellow at The Takshashila Institution. He is on twitter @pranaykotas

 

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सामाजिक क्रांति और भारतीय संविधान : एक अद्वितीय प्रयोग

असंख्य सामाजिक कुरीतियों पर अंकुश लगाने की ज़िम्मेदारी संविधान के लिए एक कठोर परीक्षा है

– प्रणय कोटस्थाने

आम तौर पर ‘क्रांति’ और ‘संविधान’ को विरोधार्थी सन्दर्भों में समझा जाता है । क्रन्तिकारी बदलाव के बारे में सोचते हुए अक़्सर हमारे मन में आंदोलन, जोश-ख़रोश, हिंसा और विशाल जनसमूहों के चित्र सामने आ जाते हैं । वहीं संवैधानिक बदलाव के साथ हम अक़्सर समझौते, धीमें बदलाव, विचार-विमर्श वगैरह जैसी मंद क्रियाएँ जोड़ देते हैं । केवल भारतीय संविधान ही एक ऐसा प्रयोग है जो इन दोनों भिन्न धारणाओं को व्यापक तौर पर साथ ला सका है ।

संविधान को सामजिक बदलाव का मुख्य एजेंट बनाना न केवल एक साहसिक प्रयोग था, यह एक अद्वितीय कदम भी था । साहसिक इसलिए क्यूंकि १९४७ तक भारतीय समाज नाना प्रकार की कुरीतियों की वजह से खोखला हो चूका था । जातिवाद, साम्प्रदायिकता, भूखमरी और गरीबी ने समाज को कमज़ोर बना दिया था । ऐसे वक़्त पर हमारे संविधान के रचयिताओं ने इन समस्याओं का ख़ात्मा करने का बीड़ा उठाया । साथ ही यह कदम अद्वितीय इसलिए था क्यूंकि उस वक़्त तक किसी भी संविधान ने क्रान्ति लाने का जिम्मा नहीं उठाया था । उदराहणार्थ , अगर हम अमरीकी संविधान पर नज़र डाले तो पता चलता है कि वह एक कन्सर्वेटिव रचना है । उसमें  केवल उस समय के मानदंडों की रक्षा करने का भाव है ।

संविधान रचयिताओं की यह असाधारण पहल ज़रूरी भी थी और शायद सही भी थी , किन्तु इस प्रयोग के कुछ साइड इफेक्ट्स भी हुए जो आज तक चले आ रहें हैं और जिन्हें समझना ज्ञानवर्धक होगा ।

एक, इस क्रांतिकारी बदलाव की कोशिश ने पूरे संविधान की वैधता पर सवालिया निशान लगा दिए । जो लोग सदियों से जात-पात या दहेजप्रथा जैसी दक़ियानूसी बातों में विश्वास रखते थे , वे यह पूछने लगे कि चंद लोगों के कल लिखे हुए कुछ  पन्नें आखिर किस रूप से प्राचीन रीति रिवाजों से बेहतर हैं ? ऐसा सोचने वाले आज भी मौजूद हैं खाप पंचायतों के रूप में जो गोत्र और जाति जैसी मनघड़ंत बातों पर आँख मूँद कर विश्वास रखने पर आमादा हैं । और जब कुछ लोग संविधान के एक क्षेत्र को नकारने लगें तो इस अवैधता का डर संविधान के अन्य क्षेत्रों को भी सताने लगा । उदाहरणार्थ, जो संविधान की छुआछूत उन्मूलन के सविचार के विरोध में थे, वह संविधान के धर्मनिरपेक्ष प्रावधानों को भी धिक्कारने लगे ।

दूसरा, सामाजिक परिवर्तन का जिम्मा उठाने की वजह से भारत गणराज्य का काम कई गुना बढ़ गया । कौटिल्य अर्थशास्त्र में कहा गया है कि राज्य के अभाव में मत्स्यन्याय की अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति अपने बल के आधार पर अपने से कमज़ोर व्यक्तियों के साथ जैसा चाहे व्यवहार कर सकता है । अतः राज्य का स्थापन मत्स्यन्याय की स्थिति का अंत करने के लिए हुआ। चाहे राजतंत्र हो या लोकतंत्र, राज्य की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है हर व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना, चाहे वह कितना ही कमज़ोर क्यों न हो । इस धारणा को rule of law कहा जाता है और हम अपनी ओर ही देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि हमारा गणराज्य इस मुख्य उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाया है । ऐसी नाज़ुक अवस्था में भारतीय गणराज्य ने सामाजिक परिवर्तन का एक और महाकार्य अपने कन्धों पर ले लिया जिससे राज्य की कठिनाईयाँ और बढ़ गयी । उदाहरणार्थ, एक पुलिस अफसर का कार्य सिर्फ कानून की रक्षा करने तक सीमित नहीं है – उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि दहेज, छुआछुत जैसे प्रकरण समाज में ना हो पाए ।

इन दोनों नकारात्मक पहलुओं का तात्पर्य यह नहीं कि हमें अपने संवैधानिक मार्ग त्याग दे, बल्कि हमें इस बोल्ड प्रयोग को सफल बनाने की और दृढ़ता से मेहनत करनी चाहिए । शायद हमारा गणराज्य निर्दोष नहीं , लेकिन यह हमारा सर्वश्रेष्ठ विकल्प हैं । इसके सारे पहलुओं पर रोशनी डालने से हम इसको बेहतर समझ पाएंगे । आख़िर इसकी सफलता में ही हम सबकी कामयाबी है ।

Pranay Kotasthane is a Policy Analyst at The Takshashila Institution. He is on twitter at @pranaykotas.

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