पारम्परिक सुरक्षा नीति को नेटवर्क—समाजों की पुरज़ोर चुनौती

कहानी पारम्परिक श्रेणीबद्ध सरकार और एक नेटवर्क-समाज के बीच के संघर्ष की

by Pranay Kotasthane (@pranaykotas)

गत १ अगस्त को ट्विटर पर कोलकाता में दंगे की तेज़—तर्रार अफवाहों ने पुलिस और राजकीय प्रशासन को क्लीन बोल्ड कर दिया। इस कहानी को विस्तार से जानने के लिए शोएब दान्याल का यह लेख पढ़ें। संक्षिप्त में हुआ यह कि रेलवे पुलिस ने १ अगस्त को मदरसों के कुछ छात्रों को सियालदाह स्टेशन से पकड़कर बारासात के एक युवा कल्याण होम भेज दिया। अगले दिन सियालदाह के स्थानीय नागरिकों ने पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन किया और कोलकाता का एक मुख्य मार्ग रोक दिया। जवाब में पुलिस ने बड़ी संख्या में तैनाती की। कुछ तनावपूर्ण घंटों के उपरांत रात तक भीड़ गायब हो गयी।

लेकिन ट्विटर पर रात को कुछ और ही ड्रामा चल रहा था। लोगों ने अफवाह फैलाना शुरू कर दिया कि कोलकाता के मुस्लिमबहुल इलाकों में आतंक फ़ैल चुका है। कई सौं ट्वीट और हज़ारों रीट्वीट के बाद इस अफवाह ने साम्प्रदायिक रंग ले लिया। लेकिन किसी वजह से यह कारस्तानी सफल नहीं हुई और मंगलवार तक जन स्थिति सामान्य हो गयी।

अब एक दूसरा उदाहरण देखें — बेंगलुरु में २९ दिसंबर को चर्च स्ट्रीट नामक एक लोकप्रिय स्पॉट पर एक विस्फोट हुआ जिसमे एक महिला की जान चली गयी। ट्विटर पर यह ख़बर कुछ ऐसे फैली —

पहला ट्वीट: चर्च स्ट्रीट पर ब्लास्ट।

दूसरा ट्वीट: चर्च के नज़दीक ब्लास्ट।

तीसरा ट्वीट: बैंगलोर के एक चर्च में ब्लास्ट!

उपर्लिखित दोनों घटनाओं के आधार पर कोई भी समझदार व्यक्ति इस तरह के विषैले प्रचार के नतीजे का अनुमान लगा सकता है। इस तरह की अफवाहें न सिर्फ कहा—सुनी के आधार पर होती है, बल्कि एक सिस्टमैटिक अंदाज़ से दोहराई जा सकती है। हो सकता है कि भारत के कट्टर विरोधी राष्ट्रों की इंटेलिजेंस एजेन्सियों का एक विभाग इस तरह के ऑनलाइन प्रचार के लिए तैयार किया जा रहा हो। अतः यह अनिवार्य है कि हम इंटरनेट में इंफॉर्मेशन के संचालन को बेहतर रूप से समझे। इस प्रकार के विश्लेषण के आधार पर सरकारें इंटरनेट से आने वाले खतरों का सटीक जवाब दे पाएँगी।

मूलतः उपर्लिखित दोनों प्रसंग, पारम्परिक सरकार की संरचना और एक नेटवर्क-समाज के बीच के संघर्ष का परिचायक है। आज का समाज एक नेटवर्क-समाज हैं। ऐसे समाज में इंसान एक दुसरे से नेटवर्क के ज़रिये बड़ी तेज़ी से दूरियों को लांघ सकते हैं । साथ ही, नेटवर्क—समाज का हर सदस्य न सिर्फ खबरों का उपभोग करता है, बल्कि वह खबरों का रचयिता भी है। इंटरनेट का यह श्रेणीविहीन व्यक्तित्व ही उसकी सबसे बड़ी ताक़त है जिसकी वजह से हमारा जीवन मूलभूत रूप से तब्दील हो चुका है।

दूसरी और सरकारें आज भी श्रेणीबद्ध है । इस संरचना के चलते इंफॉर्मेशन का प्रवाह सरकारों में नीचे तबके से ऊपर की ऒर होता है | जबकि नतीजे ऊपर से नीचे की ऒर प्रवाह करते हैं । यह क्रमबद्ध प्रवाह का स्वभाव धीमा होता है । अतः नेटवर्क—समाज की जुटाव (mobilisation) की गति सरकारों की प्रतिक्रिया की गति से कई गुना अधिक है। तो सवाल यह है कि  सरकारों के पास क्या विकल्प हैं?

एक विकल्प हैं नेटवर्क को बहुत बारीकी से नियंत्रित करना। जब भी अफवाह फैलने लगे तो इंफॉर्मेशन प्रवाहों को ब्लॉक कर देना। यह मॉडल चीन में कई परिवेशों में आज़माया जा चुका है । लेकिन नेटवर्क के फैलाव और लगातार बढ़ते स्त्रोतों को मद्देनज़र रखते हुए यह विकल्प असरहीन हो रहा है। साथ ही, भारत सरकार को अपने देशवासियों पर जासूसी करना, हमारे गणतांत्रिक संविधान का उल्लंघन होगा।

दूसरा विकल्प है कि सरकारें खुद अपनी संरचना को बदले, और नेटवर्क की मांग के अनुसार ढाल लें। इस विकल्प की  झलक बैंगलोर के चर्च स्ट्रीट हादसे के बाद दिखी जब अफवाहों को बंद करने के लिए कुछ ही मिनटों में बैंगलोर पुलिस के आला अफसरों ने ट्विटर और फेसबुकपर सही जानकारी को लोगों के साथ बाँटा। यह प्रत्युत्तर असरदायी रहा क्यूंकि कई समय से बैंगलोर पुलिस सभी डिजिटल मीडिया पर सक्रिय है। नागरिकों की समस्याओं और सुझावों का शालीनता से उत्तर भी देती है । अतः बैंगलोर पुलिस डिपार्टमेंट डिजिटल मीडिया में एक विश्वसनीय पात्र के रूप में स्थापित हुआ है। इस  उदहारण को सुरक्षा नीति का महत्त्वपूर्ण अंग बनाने की आवश्यकता है।

इसी तरह सरकारों को नेटवर्क के कईं और पहलू अपनाने भी होंगे और नेटवर्क शैली में पारंगत भी होना पड़ेगा । तभी हमारी सुरक्षा नीति नेटवर्क—समाज की चुनौती का सामना कर पाएगी।

(This post also appeared on NDTV India blogs)

Pranay Kotasthane is a Research Fellow at The Takshashila Institution. He is on twitter @pranaykotas

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