“नोतुन प्रजन्मो — नई दिशा” : भारतीय विदेश नीति के बदलते समीकरण

बांग्लादेश दौरे से कुछ ऐसे समीकरण सामने आ रहे हैं जो भारतीय विदेश नीति के प्रभाव का परिचायक बनेंगे

by Pranay Kotasthane (@pranaykotas) and Pradip Bhandari

जून ७ को भारत और बांग्लादेश ने “नोतुन प्रजन्मो — नई दिशा” नामक संयुक्त घोषणापत्र से अपने द्विपक्षीय संबंधों को एक नया आयाम दिया। प्रधानमंत्री की इस यात्रा में भूमि सीमा समझौते पर मोहर लग गई। समुद्रीय सीमा के पारस्परिक समाधान के उपरांत यह भूमि सीमा समझौता दोनों देशों के रिश्तों में दूसरी लगातार सफलता हैं।

इन दो बाधाओं के हटने से दोनों देश अपनी प्रमुख मांगों को एक दुसरे के सामने बेजिझक रूप से रखने में सफल रहे । जहाँ भारत ने बांग्लादेश से अपने पूर्वोत्तर राज्यों के बांग्लादेश से अभिगम (access) की मांग में सीमित सफलता पाई, बांग्लादेश ने तीस्ता मसले को जल्द निपटाने की बात उठाई।

हालांकि इन मामलों का पूर्ण समाधान अभी दूर है, इन नुकिलें विषयों पर खुलकर बातचीत ही अपनेआप में एक मील का पत्थर है । इन दोनों विषयों पर प्रगति ही भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय साझेदारी को निर्धारित करेगी । साथ ही, इस दौरे से कुछ ऐसे समीकरण सामने आ रहे हैं जो भारतीय विदेश नीति के प्रभाव का परिचायक बनेंगे। आइए, इन समीकरणों पर ध्यान केंद्रित करें।

सर्वप्रथम, यह स्पष्ट हो चुका है कि भारत अपनी विदेश नीति में दोस्ताना पड़ोसी राष्ट्रों को प्राथमिकता देगा । इससे पहले भारत की विदेश नीति प्राथमिकता थी पाकिस्तान के साथ सर्व विवादों पर शांतिपूर्ण समझौता। इस प्राथमिकता के चलते दुसरे पड़ोसियों से रिश्ते और सुदृढ़ करना मुश्किल हो गया था क्यूंकि हमारा ध्यान पाकिस्तान पर केंद्रित था । सार्क (SAARC) जैसे बहुराष्ट्रीय मंच भी पाकिस्तान की कटुता के चलते प्रभावहीन हो गए। लेकिन अब, इस सरकार ने साफ़ कर दिया हैँ कि पाकिस्तान को उतना ही महत्व दिया जाएगा जितना वह उसका हकदार है। रक्षा मंत्री के पाकिस्तान के ख़िलाफ़ आतंकवाद पर वक्तव्य के अलावा, सरकार की पाकिस्तान नीति अब तक भारतीय राष्ट्रहित के लिए सकारात्मक रही है।

दूसरा, इस दौरे की सफलता से यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत को पड़ोसी राष्ट्रों के दोस्ताना राजनायकों को प्रोत्साहन देना चाहिए। फिर चाहे वह मालदीव हो, बांग्लादेश हो  या श्रीलंका, अगर कोई राजनेता भारत-समर्थक है, तो भारत को खुलकर दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहिए। अगर ऐसे राजनेताओं की शुभकामनाओं के लिए हमे कुछ अतिरिक्त जतन करने पड़े, तो करने चाहिए।  इस तरह भारत एक सशक्त संकेत प्रसारित करेगा कि जो नेता भारत के शुभ चिंतक हैं, उन्हें भारत मुश्किल क्षणों में भी सहायता करने का सामर्थ्य रखता हैं ।

तीसरा समीकरण है भारतीय राज्यों की विदेश नीति मैं बढ़ती भागीदारी। भूमि सीमा समझौते पर हस्ताक्षर के वक्त पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की मौजुदगी विदेश नीति मैं राज्यों की बढ़ती साझेदारी की तरफ संकेत करती है। यह इस बात का प्रमाण है कि केंद्र सरकार को यह अहसास हो चुका है कि ‘पड़ोसी पहले’ की नीति तभी सफल हो सकती है जब सीमा स्थित राज्यों को भी भागीदार बनाया जाए। साथ ही यह सरकार की ‘कॉपरेटिव फेडेरलिस्म’ की नीति के साथ भी समन्वय रखता है।

चौथा समीकरण है यह एहसास कि पड़ोसियों से बातचीत में सार्क जैसे बहुपक्षीय मंच की बजाय अलग-अलग द्विपक्षीय साझेदारियां बेहतर काम करती हैं । सार्क में पाकिस्तान की उपस्थिति से आसान कार्य भी पेचीदा हो जाते हैं । और ऐसी कोई भी भारतीय मांग नहीं हैं जो केवल सार्क मंच पर की जा सकती है, द्विपक्षीय स्तर पर नहीं । अतः सार्क में अपनी शक्ति ज़ाया करने से अच्छा है कि भारत आत्मविश्वास से द्विपक्षीय साझेदारियों का एक सशक्त नेटवर्क स्थापित करें।  

“नोतुन प्रजन्मो — नई दिशा” अर्थात “नयी पीढ़ी—नयी दिशा” का नारा क्या भारत विदेश नीति का भी परिचायक होगा?

यह तो उपर्लिखित चार समीकरण निर्धारित करेंगे। फिलहाल, हमें इस बात पर ध्यान देना है कि यह समीकरण स्वतः भारतीय गणतंत्र की घरेलु सफलता पर आधारित हैं। इस सफ़लता के लिए हमें आर्थिक स्तर पर वृद्धि और सामाजिक स्तर  पर सद्भावना की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे ।

Pranay Kotasthane is a Research Fellow at The Takshashila Institution. He is on twitter @pranaykotasPradip Bhandari is a student of the GCPP3 batch. He is the Coordinator, Youth Forum of Thalassemia & Child Welfare Group, in Indore.

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