फायदा अठन्नी का और खर्चा एक रुपये का

कहानी विनिमय लागत (transaction cost) की 

— प्रखर मिश्रा (@prakharmisra) और प्रणय कोटस्थाने (@pranaykotas)

इस श्रृंखला के पिछले अध्याय में हमने अवसर लागत की संकल्पना को समझा । इस पोस्ट में हम एक और ऐसी लागत से परिचय करेंगे, जिससे हमारा पाला तो हर रोज़ पड़ता है पर हम उससे जुड़े कारण और अन्य पहलुओं को अक़्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं ।

मान लीजिये कि आपको एक १०,००० रुपये का टेलीविज़न ख़रीदना है। एक सुपरस्टोर (जो आपके निकटतम टेलीविज़न स्टोर से १० किलोमीटर दूर है) में १० प्रतिशत छुट का इश्तेहार आपको यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि कौनसा सौदा अधिक फ़ायदेमंद है? अगर हम केवल दोनों दुकानो में टी.वी. की क़ीमत मात्र के आधार पर फ़ैसला करें तो सुपरस्टोर निस्संदेह बेहतर विकल्प हैं।

पर अगर हम इस समस्या को बारिकी से देखें तो जानेंगे कि  जवाब इतना आसान नहीं है । मसलन, आप इस १० किलोमीटर दूर सुपरस्टोर तक कार में पहुँचने की अतिरिक्त लागत जोडें । फिर सुपरमार्केट में कार पार्किंग की क़ीमत जोड़े। इस पूरे प्रकरण में अपने ज़ाया किये गए वक़्त की अवसर लागत जोड़े। जब आप इन लागतों की गणना करेंगे, तो पाएंगे कि अधिक फ़ायदे वाला विकल्प निकटतम स्टोर से संतुष्ट रहने में भी हो सकता है ।

इस उदहारण से हम यह समझते हैं कि किसी भी ख़रीदी की कुल लागत के दो हिस्से होते हैं । एक — ख़रीदी गयी वस्तु की क़ीमत और दो — वह लागत जो इस विनिमय को अंजाम देने की प्रक्रिया में खर्च होती है । इसी कुल लागत के दुसरे हिस्से को “विनिमय लागत” कहा जाता है ।

साथ हीकिसी भी विनिमय के तीन अंग हो सकते हैं —

१. शोधकार्य: विनिमय की पहली कड़ी है शोध। एक ख़रीददार को शोध होती है ऐसे बेचने वाले की, जो उसके बजट में उसे अपनी मनपसंद वस्तु बेच सके । उदाहरणार्थ, इंटरनेट की लोकप्रियता से पहले की बात है — लोग शॉपिंग के नाम पर दर-बदर दुकानों के चक्कर लगाते थे क़ीमत का अंदाज़ा लगाने के लिए । साथ ही दुकान वालों को ठीक खरीददार ढूंढने के लिए पोस्टर-पर्ची में पैसे लगाने पड़ते थे। इस शोध प्रक्रिया में ज़ाया हुए संसाधन विनिमय लागत का अहम हिस्सा है।

२. मोल-तोल प्रक्रिया: सौदेबाज़ी की प्रक्रिया में ज़ाया संसाधन भी विनिमय लागत का हिस्सा है । अगर मोल-तोल करना दुःखदायी हो तो विनिमय लागत इतनी बढ़ सकती है कि सौदा होता ही नहीं । उदहारण के लिए, कुछ ऑटो-रिक्शा चालक मीटर का उपयोग किये बिना हर ग्राहक से मोल-तोल का सौदा करने के इच्छुक होते हैं । यह प्रक्रिया हर दिन यात्रियों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है, अर्थात उन्हें यह लागत बहुत अधिक लगती है । नतीजतन, कई लोग ऑटो न लेकर, अधिक रेट पर टैक्सी/कैब लेना पसंद करते हैं । अतः, जितना ज़्यादा मोल-तोल, उतनी ज़्यादा विनिमय लागत ।

३. नीति और लागू लागत: विनिमय का एक बड़ा हिस्सा है कि तय हुई शर्तों का पालन हो । अगर तय शर्तों को लागू करने की लागत बहुत अधिक हो, तो सौदा नहीं होता। उदहारण के लिए, अगर आपके द्वारा ख़रीदे हुए नए कपड़े पहली ही धुलाई में रंग छोड़ने लगें, तो आप चाहेंगे कि इस नुकसान का जल्द भरपाया हो । अगर बेचने वाला यह नुक़सान भरने से आनाकानी करें, तो यह सौदा महंगा हो जाता है । इसी वजह से अक़्सर वारंटी का उपयोग किया जाता है । वारंटी एक सिग्नल है ग्राहक के लिए कि इस विनिमय को लागू करने की लागत कम से कम होगी ।

नोट कीजिये किस तरह इंटरनेट से विनिमय लागत कम हुई है और आप जान जाएंगे कि ऑनलाइन शॉपिंग की सफ़लता का राज़ क्या है!

विनिमय लागत का पब्लिक पॉलिसी से क्या लेना देना?
विनिमय लागत किसी भी आर्थिक गतिविधि पर बोझ है । यह लागत बेचने वाले को भी अदा करनी पड़ती है और खर्च करने वाले को भी। उसे शुन्य भी नहीं किया जा सकता । जितनी ज़्यादा विनिमय लागत, उतना कम प्रोत्साहन एक आर्थिक गतिविधि के लिए । जब विनिमय लागत बहुत अधिक हो जाती है तो आर्थिक विकास में बाधा डालती है।

बाज़ार कई ग्राहकों और कई बेचने वालों को एक स्थान पर लाकर विनिमय लागत कम करते हैं|Image courtesy: McKay Savage, Flickr

बाज़ार कई ग्राहकों और कई बेचने वालों को एक स्थान पर लाकर विनिमय लागत कम करते हैं| Image courtesy: McKay Savage, Flickr

उदहारण ले सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी Public Distribution System (PDS) का। कई बार इस प्रणाली के फायदों से ग़रीब भी वंचित रह जाता है । इसका कारण भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि अत्यधिक विनिमय लागत का है। दूर-दराज़ से एक PDS दूकान आने का खर्चा, लाइनों में खड़ा रहकर एक-आधे दिन का वेतन गँवाने की अवसर लागत और गुणवत्ता लागू करने की बड़ी लागत को मद्देनज़र रख कर कई लोग खुले बाज़ार से ही अन्न ख़रीदना पसंद करते हैं ।

अतः, अच्छी पॉलिसी वह होती है जो विनिमय लागत को कम रख सके — बेचने वाले के लिए भी  भी और ख़रीदने वाले के लिए भी। ऐसा न करने पर फायदा होता है अठन्नी का और खर्चा होता है एक रुपये का

Prakhar Misra is a Fellow at the Swaniti Initiative and is a Takshashila GCPP alumnus. He is on twitter @prakharmisra

Pranay Kotasthane is a Research Fellow at The Takshashila Institution. He is on twitter @pranaykotas

, , , , ,

No comments yet.

Leave a Reply